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Monthly Archives: ઓગસ્ટ 2015

અનામત વિતરણ સમારંભ


મિત્રો લોકલાગણીને માન આપીને સૌને અનામત આપવી-
એવું આપણે નક્કી કર્યું છે,
એટલે કોઈએ ધક્કામુક્કી કરવાની જરૂર નથી.
એક પછી એક તમામ જ્ઞાતિ શાંતિથી અહી આવે
અને પોતાની અનામત લઈ જાય .

આટલી જાહેરાત પછી વિતરણ સમારંભ શરૂ થાય છે
અને રંગે ચંગે પૂરો થાય છે .

અંતે વિજયી સ્મિત સાથે વરિષ્ઠ નેતા ભાષણ કરવા માટે ઊભા થાય છે-
એ જ વખતે ભીડમાંથી અથડાતો કુટાતો એક વ્યક્તિ માંડ માંડ આગળ આવીને કહે-
સાહેબ ! હું તો રહી જ ગયો ! મને પણ કઇંક આપો.
નેતાશ્રી કહે જરૂર જરૂર તમને પણ આપવામાં આવશે જ,
બોલો તમારી જ્ઞાતિ ?
હાંફતા હાંફતા એ વ્યક્તિ કહે “ માણસ”

બાજુમાં જ  રહેલા વિતરણ અધિકારી લીસ્ટમાં તપાસ કરીને-
નેતાશ્રીના કાનમાં કહે, સાહેબ !
“માણસ” નામની કોઈ જ્ઞાતિ તો આપણાં લીસ્ટમાં છે જ નહીં .

 
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Posted by on ઓગસ્ટ 23, 2015 in અંગત

 

शेर को चुनौती


एक गधे ने एक शेर को चुनौती दे दी
कि मुझसे लड़ कर दिखा तो जंगल वाले तुझे राजा मान लेंगे | लेकिन शेर ने गधे की बात को अनसुना कर के चुपचाप वहाँ से निकल लिया |

एक लोमड़ी ने छुप कर ये सब देखा और सुना तो उस से रहा नहीं गया और वो शेर के पास जा कर बोली : क्या बात है ? उस गधे ने आपको चुनौती दी फिर भी उस से लड़े क्यों नहीं ? और ऐसे बिना कुछ बोले चुपचाप जा रहे हो ?

शेर ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया : मैं शेर हूँ – जंगल का राजा हूँ और रहूँगा | सभी जानवर इस सत्य से परिचित हैं | मुझे इस सत्य को किसी को सिद्ध कर के नहीं दिखाना है | गधा तो है ही गधा और हमेशा गधा ही रहेगा | गधे की चुनौती स्वीकार करने का मतलब मैं उसके बराबर हुआ इसलिये भी गधा ।

गधे की बात का उत्तर देना भी अपनी इज्जत कम करना है क्योंकि उसके स्तर की बात का उत्तर देने के लिये मुझे उसके नीचे स्तर तक उतरना पड़ेगा और मेरे उस के लिये नीचे के स्तर पर उतरने से उसका घमण्ड बढ़ेगा | मैं यदि उसके सामने एक बार दहाड़ दूँ तो उसकी लीद निकल जायेगी और वो बेहोश हो जायेगा – अगर मैं एक पंजा मार दूँ तो उसकी गर्दन टूट जायेगी और वो मर जायेगा | गधे से लड़ने से मैं निश्चित रूप से जीत जाऊँगा लेकिन उस से मेरी इज्जत नहीं बढ़ेगी बल्कि जंगल के सभी जानवर बोलने लगेंगे कि शेर एक गधे से लड़ कर जीत गया – और एक तरह से यह मेरी बेइज्जती ही हुई |

इन्हीं कारणों से मैं उस आत्महत्या के विचार से मुझे चुनौती देने वाले गधे को अनसुना कर के दूर जा रहा हूँ ताकि वो जिंदा रह सके |

लोमड़ी को बहुत चालाक और मक्कार जानवर माना जाता है लेकिन वो भी शेर की इन्सानियत वाली विद्वत्तापूर्ण बातें सुन कर उसके प्रति श्रद्धा से भर गयी |

यह बोधकथा समझनी इस लिये जरूरी है कि जिन्दगी में आये दिन गधों से वास्ता पड़ता रहता है – और उनसे कन्नी काट कर निकल लेने में भलाई होती है |

शेर हमेशा ही गधों से लड़ने से कतराते आये हैं –
इसीलिए गधे खुद को तीसमारखाँ और
अजेय समझने लगे हैं ।

 
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Posted by on ઓગસ્ટ 18, 2015 in બોધ કથાઓ

 

अहंकार


महाकवि कालिदास अपने समय के महान विद्वान थे। उनके कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था। शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था।

अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया। उन्हें लगा कि
उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर
लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा। उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं।

एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ
का निमंत्रण पाकर कालिदास महाराज
विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए। गर्मी का मौसम था, धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग आई। जंगल का रास्ता था और दूर तक कोई
बस्ती दिखाई नहीं दे रही थी। थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी। पानी की आशा में वो उस ओर बढ चले। झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था। कालिदास जी ने सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी
देने का अनुरोध किया जाए। उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली। बच्ची ने कुएं से पानी भरा और जाने लगी।

कालिदास उसके पास जाकर बोले ” बालिके! बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे।”

बच्ची ने कहा, “आप कौन हैं? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए।”

कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं
जानता मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता? फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले, “बालिके अभी तुम छोटी हो। इसलिए मुझे नहीं जानती। घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो। वो मुझे
देखते ही पहचान लेगा। मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर-दूर तक। मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूं।”

कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली, “आप असत्य कह रहे हैं। संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं। अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं?”

थोङी देर सोचकर कालिदास बोले, “मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो। मगर मुझे पानी पिला दो। मेरा गला सूख रहा है।”

बालिका बोली, “दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल’। भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें। देखिए तेज़ प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है।”

कलिदास चकित रह गए। लड़की का तर्क अकाट्य था। बड़े से बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे।

बालिका ने पुनः पूछा, “सत्य बताएं, कौन हैं आप?”

वो चलने की तैयारी में थी, कालिदास
थोड़ा नम्र होकर बोले, “बालिके! मैं बटोही हूं।”

मुस्कुराते हुए बच्ची बोली, “आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं। संसार में दो ही बटोही हैं। उन दोनों को मैं जानती हूँ, बताइए वो दोनों कौन हैं?”

तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास जी की बुद्धि क्षीण कर दी थी। लेकिन लाचार होकर उन्होंने फिर अनभिज्ञता व्यक्त कर दी।

बच्ची बोली, “आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है। बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और
दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं। आप तो थक गए हैं। भूख प्यास से बेदम हो रहे हैं। आप कैसे बटोही हो सकते हैं?”

इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई। अब तो कालिदास और भी दुखी हो गए। इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए। प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी। दिमाग़ चकरा रहा था। उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा। तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली। उसके हाथ में खाली मटका था। वो कुएं से पानी भरने लगी।

अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास बोले, “माते !प्यास से मेरा बुरा हाल है। भर पेट पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा।”

बूढी माँ बोलीं, ” बेटा मैं तुम्हे जानती नहीं। अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूँगी।”

कालिदास ने कहा, “मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें।” “तुम मेहमान कैसे हो सकते हो? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता,सत्य बताओ कौन हो तुम?”

अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश कालिदास बोले “मैं सहनशील हूं। पानी पिला दें।”

“नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है, उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है। दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ कौन हो?”

कालिदास लगभग मूर्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले, ” मैं हठी हूं।”

“फिर असत्य। हठी तो दो ही हैं, पहला नख और दूसरा केश। कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप?”

पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास ने कहा, “फिर तो मैं मूर्ख ही हूं।”

“नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो। मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।”

कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे।

उठो वत्स… ये आवाज़ सुनकर जब कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी। कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए।

“शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे। इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।”

कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

 
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Posted by on ઓગસ્ટ 17, 2015 in બોધ કથાઓ

 

ટૅગ્સ:

તું મિત્ર છે.


આજે Friendship Day પર મારા પ્રિય અને મન ગમતા શ્રી સુરેશ દલાલ ની એક રચના:

તું વૃક્ષનો છાંયો છે, નદીનું જળ છે,
ઊઘડતા આકાશનો ઉજાસ છે:
તું મિત્ર છે.

તું થાક્યાનો વિસામો છે, રઝળપાટનો આનંદ છે,
તું પ્રવાસ છે, સહવાસ છે:
તું મિત્ર છે.

તું એકની એક વાત છે, દિવસ ને રાત છે, કાયમી સંગાથ છે:
તું મિત્ર છે.

હું થાકું ત્યારે તારી પાસે આવું છું,
હું છલકાઉં ત્યારે તને ગાઉં છું,
હું તને ચાહું છું :
તું મિત્ર છે.

તું વિરહમાં પત્ર છે, મિલનમાં છત્ર છે, તું અહીં અને સર્વત્ર છે:
તું મિત્ર છે.

તું બુદ્ધનું સ્મિત છે, તું મીરાનું ગીત છે,
તું પુરાતન તોયે નૂતન અને નિત છે:
તું મિત્ર છે.

તું સ્થળમાં છે, તું પળમાં છે;
તું સકળમાં છે અને તું અકળ છે:
તું મિત્ર છે..

સુરેશ દલાલ.

#FriendshipDay

 

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