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Category Archives: સરસ

​મમ્મી એપ્રિલ ફૂલ બનાવતી હોય છે      -ડૉ. નિમિત ઓઝા 


કેસેરોલમાં રહેલી છેલ્લી રોટલી આપણને આપીને, ‘મને તો જરાય ભૂખ જ નથી’ એવું જ્યારે કહેતી હોય છે ત્યારે મમ્મી એપ્રિલ ફૂલ બનાવતી હોય છે.
રોજ સવારે મંદિરમાં પ્રાર્થના કરતી વખતે, ‘મારે કશું જ જોઈતું નથી’ એવું જ્યારે ઈશ્વરને કહેતી હોય છે ત્યારે મમ્મી એપ્રિલ ફૂલ બનાવતી હોય છે. 

આપણી જેમ આપણી નિષ્ફતાઓને વ્હાલ કરીને, આપણી ઉદાસી ઉપર હાથ ફેરવીને ‘બધું સારું થઈ જશે’ એવું કહેતી હોય છે ત્યારે મમ્મી આપણી ઉદાસીને એપ્રિલ ફૂલ બનાવતી હોય છે.

પોતાની આંખોમાં ડાયપર સંતાડી, મમ્મી જ્યારે કોરું કટ્ટ રડતી હોય છે ત્યારે ચહેરા ઉપર ‘મેડ ઇન ચાઈના’ વાળું સ્માઈલ લગાડીને મમ્મી આપણી આંખોને એપ્રિલ ફૂલ બનાવતી હોય છે. 

આપણી સાથે આખી રાત જાગીને ‘મને તો ઊંઘ જ નથી આવતી’ એવું જ્યારે કહેતી હોય છે ત્યારે મમ્મી ઉજાગરાને એપ્રિલ ફૂલ કહેતી હોય છે. 

છાતીમાં દુખતું હોય કે ઘૂંટણનો દુઃખાવો હોય, માથું દુખે કે તાવ આવતો હોય, મમ્મી વાત વાતમાં એપ્રિલ ફૂલ બનાવે. બીમારીએ પોતાના શરીરમાં નિમંત્રણ કાર્ડ છપાવીને ઉદઘાટન કરેલું હોય તેમ છતાં મમ્મીને તો એ વાતની જાણ ક્યારેય હોતી જ નથી. પોતાના મજબૂત મનોબળની દીવાલ પર પોતાની બધી જ બીમારીઓને પ્રદર્શન માટે ટીંગાડીને ‘મને તો સાવ સારું છે’ એવું જ્યારે કહેતી હોય છે ત્યારે મમ્મી એપ્રિલ ફૂલ બનાવતી હોય છે. 

દરેક વખતે પૂછાયેલા ‘કેમ છો?’ ના જવાબમાં એકપણ સેકન્ડનો ‘pause’ આપ્યા વગર ‘મજામાં છું’ કહેતી હોય છે ત્યારે મમ્મી એપ્રિલ ફૂલ બનાવતી હોય છે.

 

ટૅગ્સ:

बंदरों की ज़िद्द


एक बार कुछ scientists ने एक बड़ा ही interesting experiment किया..

उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक  सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..

जैसा की expected था, जैसे ही एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..

पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..

पर experimenters यहीं नहीं रुके,
उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..

बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..

पर वे कब तक बैठे रहते,
कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..

अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..

और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..

एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए…

थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ..

बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..

अब experimenters ने एक और interesting चीज़ की..

अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..

नया बन्दर वहां के rules क्या जाने..

वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..

पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..

उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..

ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..

इसके बाद experimenters ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..

इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!

experiment के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..

पर उनका behaviour भी पुराने बंदरों की तरह ही था..

वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..

Friends, हमारी society में भी ये behaviour देखा जा सकता है..

जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, business, राजनीती, समाजसेवा या किसी और field से related हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..

उसे failure का डर दिखाया जाता है..

और interesting बात ये है कि उसे रोकने वाले maximum log वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस field में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..

इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों का opposition face करना पड़ रहा है तो थोड़ा संभल कर रहिये..

अपने logic और guts की सुनिए..
ख़ुद पर और अपने लक्ष्य पर विश्वास क़ायम रखिये..
और बढ़ते रहिये..

कुछ बंदरों की ज़िद्द के आगे आप भी बन्दर मत बन जाइए..

 

માણસ મને મળ્યો નહિ


સરનામે નામે “માણસ”, માણસ મને મળ્યો નહિ
અંતે લીધું મેં ફાનસ, માણસ મને મળ્યો નહિ

ખુલ્લા દિલે રમતની, બાજી બતાવે એવો
એકાદ પણ નિખાલસ, માણસ મને મળ્યો નહિ

ચશ્માની પાર શોધ્યો, ઝાંખો મળે તો ઝાંખો
ગાંધીનો સાચો વારસ, માણસ મને મળ્યો નહિ

જીવે એ મૌન ઉપર, જે મોતથીયે બદતર
શબ્દોનો ભુખડીબારસ, માણસ મને મળ્યો નહિ

એવું વિચારી, ચાલો, અહિયાં તો કો’ક મળશે
ઉથલાવ્યા સઘળા આરસ, માણસ મને મળ્યો નહિ

 
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Posted by on ફેબ્રુવારી 18, 2015 in સરસ, સારી કવિતાઓ

 

ટૅગ્સ:

ત્યારે પ્રોબ્લેમ થાય છે


પાણી વગર હોડી ના ચાલી શકે એ હકીકત છે
પણ હોડીમાં પાણી આવી જાય ત્યારે પ્રોબ્લેમ થાય છે
 
પૈસા વગર સારી રીતે ના જીવાય એ હકીકત છે,
પણ પૈસો માણસને નમાવી જાય ત્યારે પ્રોબ્લેમ થાય છે
 
કદરૂપતા માણસને નથી ગમતી એ હકીકત છે,
પણ રૂપ માનવીને ફસાવી જાય ત્યારે પ્રોબ્લેમ થાય છે
 
સંબંધ વિના માનવી અધુરો છે એ હકીકત છે,
પણ પોતાનું માણસ રડાવી જાય ત્યારે પ્રોબ્લેમ થાય છે
 
વિશ્વાસ રાખ્યા વગર ચાલતું નથી એ હકીકત છે,
પણ કોઈ ખોટો લાભ ઉઠાવી જાય ત્યારે પ્રોબ્લેમ થાય છે
 
કોઈ માણસ પોતે સર્વજ્ઞાની નથી એ હકીકત છે,
પણ કોઈ અધુરો બહુ છલકાઈ જાય ત્યારે પ્રોબ્લેમ થાય છે.

 
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Posted by on ડિસેમ્બર 15, 2014 in સરસ, સારી કવિતાઓ

 

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कैंची और सुई


एक दिन किसी कारण से स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण,एक दर्जी का बेटा, अपने पापा की दुकान पर चला गया ।

वहाँ जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पापा को काम करते हुए देखने लगा ।

उसने देखा कि उसके पापा कैंची से कपड़े को काटते हैं और कैंची को पैर के पास टांग से दबा कर रख देते हैं ।

फिर सुई से उसको सीते हैं और सीने के बाद सुई को अपनी टोपी पर लगा लेते हैं ।

जब उसने इसी क्रिया को चार-पाँच बार देखा तो उससे रहा नहीं गया, तो उसने अपने पापा से कहा कि वह एक बात उनसे पूछना चाहता है ?

पापा ने कहा-बेटा बोलो क्या पूछना चाहते हो ?

बेटा बोला- पापा मैं बड़ी देर से आपको देख रहा हूं , आप जब भी कपड़ा काटते हैं, उसके बाद कैंची को पैर के नीचे दबा देते हैं, और सुई से कपड़ा सीने के बाद, उसे टोपी पर लगा लेते हैं, ऐसा क्यों ?

इसका जो उत्तर पापा ने दिया-उन दो पंक्तियाँ में मानों उसने ज़िन्दगी का सार समझा दिया ।

उत्तर था- ” बेटा, कैंची काटने का काम करती है, और सुई जोड़ने का काम करती है, और काटने वाले की जगह हमेशा नीची होती है परन्तु जोड़ने वाले की जगह हमेशा ऊपर होती है ।

यही कारण है कि मैं सुई को टोपी पर लगाता हूं और कैंची को पैर के नीचे रखता हूं……..!!

Source:  Whatsapp msg

 
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Posted by on નવેમ્બર 20, 2014 in બોધ કથાઓ, સરસ

 

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प्रभु की लीला


एक बार श्री कृष्ण और अर्जुन भ्रमण पर निकले तो उन्होंने मार्ग में एक निर्धन ब्राहमण को भिक्षा मागते देखा अर्जुन को उस पर दया आ गयी और उन्होंने उस ब्राहमण को स्वर्ण मुद्राओ से भरी एक पोटली दे दी।

जिसे पाकर ब्राहमण ख़ुशी ख़ुशी घर लौट चला। पर राह में एक लुटेरे ने उससे वो पोटली छीन ली।

ब्राहमण दुखी होकर फिर से भिक्षावृत्ति में लग गया।

अगले दिन फिर अर्जुन की दृष्टि जब उस ब्राहमण पर पड़ी तो उन्होंने उससे इसका कारण पूछा।
ब्राहमण की व्यथा सुनकर उन्हें फिर से उस पर दया आ गयी और इस बार उन्होंने ब्राहमण को एक माणिक दिया।

ब्राहमण उसे लेकर घर पंहुचा और चोरी होने के डर से उसे एक घड़े में छिपा दिया। दिन भर का थका मांदा होने के कारण उसे नींद आ गयी, इस बीच ब्राहमण की स्त्री उस घड़े को लेकर नदी में जल लेने चली गयी और जैसे ही उसने घड़े को नदी में डुबोया वह माणिक भी जल की धरा के साथ बह गया।

ब्राहमण को जब यह बात पता चली तो अपने भाग्य को कोसता हुआ वह फिर भिक्षावृत्ति में लग गया।

अर्जुन और श्री कृष्ण ने जब फिर उसे इस दरिद्र अवस्था में उसे देखा तो जाकर सारा हाल मालूम किया।

सारा हाल मालूम होने पर अर्जुन भी निराश हुए और मन की मन सोचने लगे इस अभागे ब्राहमण के जीवन में कभी सुख नहीं आ सकता।

अब यहाँ से प्रभु की लीला प्रारंभ हुई।

उन्होंने उस ब्राहमण को दो पैसे दान में दिए।

तब अर्जुन ने उनसे पुछा “प्रभु मेरी दी मुद्राए और माणिक भी इस अभागे की दरिद्रता नहीं मिटा सके तो इन दो पैसो से इसका क्या होगा” ?

यह सुनकर प्रभु बस मुस्कुरा भर दिए और अर्जुन से उस ब्राहमण के पीछे जाने को कहा।

रास्ते में ब्राहमण सोचता हुआ जा रहा था कि”दो पैसो से तो एक व्यक्ति के लिए भी भोजन नहीं आएगा प्रभु ने उसे इतना तुच्छ दान क्यों दिया”?

तभी उसे एक मछुवारा दिखा जिसके जाल में एक मछली तड़प रही थी।
ब्राहमण को उस मछली पर दया आ गयी उसने सोचा”इन दो पैसो से पेट कि आग तो बुझेगी नहीं क्यों न इस मछली के प्राण ही बचा लिए जाये”यह सोचकर उसने दो पैसो में उस मछली का सौदा कर लिया और मछली को अपने कमंडल में डाल दिया।
कमंडल के अन्दर जब मछली छटपटई तो उसके मुह से माणिक निकल पड़ा।

ब्राहमण ख़ुशी के मारे चिल्लाने “लगा मिल गया मिल गया ”..!!!

तभी भाग्यवश वह लुटेरा भी वहा से गुजर रहा था जिसने ब्राहमण की मुद्राये लूटी थी।
उसने सोचा कि ब्राहमण उसे पहचान गया और अब जाकर राजदरबार में उसकी शिकायत करेगा इससे डरकर वह ब्राहमण से रोते हुए क्षमा मांगने लगा और उससे लूटी हुई सारी मुद्राये भी उसे वापस कर दी।

यह देख अर्जुन प्रभु के आगे नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सके।

जब आप दूसरे का भला कर रहे होते हैं,
तब आप ईश्वर का कार्य कर रहे होते हैं।

 

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એવું હવે ક્યાં કરી શકાય છે ?


ઘોડિયે નહીં તો કંઈ નહીં પણ
ઝૂલે તો હજુ ઝૂલી શકાય છે ,
પણ ભૂખ લાગે તો ક્યાં ફરી
મોંમાં અંગુઠો લઇ ચૂસાય છે ?

કંઇક શીખવાની જીજ્ઞાસા લઇ
ફરી સ્કૂલ કોલેજ જઈ શકાય છે ,
પણ દફતર ફેંકી રમવા દોડવું
એવું હવે ક્યાં કરી શકાય છે ?

ઝાડ પર નહીં તો કોલર ટયુનમાં
કોયલ- ટહુકા સાંભળી શકાય છે ,
પણ અમથું અમથું ક્યાં ફરીથી કોયલ સંગ ટહુકી શકાય છે ?

મિત્રો સંગે તાળી દઈ હજુ એ
જોને ખિલખિલ હસી શકાય છે ,
પણ મનગમતી ચીજ મેળવવા
ક્યાં હવે ભેંકડો તાણી રડાય છે ?

જા તારી કિટ્ટા છે કહીને હજુ એ
પળમાં દુશ્મની કરી શકાય છે ,
પણ બીજી જ પળે બુચ્ચા કરીને
ક્યાં કોઈને ય મનાવી શકાય છે ?

મોટા થવાની ઈચ્છા કરીને જુઓ
ઝટ મોટા તો થઇ જવાય છે ,
પણ ફરી પાછું નાના થઇ જવું ?
ક્યાં કોઈનાથી પણ થવાય છે???