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Monthly Archives: October 2014

મમ્મીની રાહમાં


ડૉ. પ્રવીણ શાહ નો બ્લોગ

  ઘણા વખત પછી હું મારા બ્લોગમાં નવી પોસ્ટ મૂકી રહ્યો છું. આ વખતે હું એક, મેં લખેલી નવી વાર્તા ‘મમ્મીની રાહમાં’  મૂકી રહ્યો છું. આશા છે કે મારા વાંચકો ને તે ગમશે.                                                                      

                                                                          મમ્મીની રાહમાં

‘હરીશભાઈ, બસ હવે, રોવાનું બંધ કરો. મનમાં થોડી શાંતિ રાખો. ગયેલું માણસ થોડું પાછું આવવાનું છે ?’

‘હરીશભાઈ, હવે તો તમારે તમારા આ છોકરાનું ધ્યાન રાખવાનું છે. મા વગરના પાંચ વર્ષના છોકરાને ઉછેરીને મોટો કરવાનો છે. એમ હિંમત હારી જશો તો કેમ ચાલશે…

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शुभ दिपावली


रात का समय था, चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था , नज़दीक ही एक कमरे में चार मोमबत्तियां जल रही थीं। एकांत पा कर आज वे एक दुसरे से दिल की बात कर रही थीं।

पहली मोमबत्ती बोली, ” मैं शांति हूँ ,
पर मुझे लगता है अब इस दुनिया को मेरी ज़रुरत नहीं है , हर तरफ आपाधापी और लूट-मार मची हुई है, मैं यहाँ अब और नहीं रह सकती। …”
और ऐसा कहते हुए , कुछ देर में वो मोमबत्ती बुझ गयी।

दूसरी मोमबत्ती बोली , ” मैं विश्वास हूँ , और मुझे लगता है झूठ और फरेब के बीच मेरी भी यहाँ कोई ज़रुरत नहीं है , मैं भी यहाँ से जा रही हूँ …” , और दूसरी मोमबत्ती भी बुझ गयी…

तीसरी मोमबत्ती भी दुखी होते हुए बोली , ” मैं प्रेम हूँ, मेरे पास जलते रहने की ताकत है, पर आज हर कोई इतना व्यस्त है कि मेरे लिए किसी के पास वक्त ही नहीं, दूसरों से तो दूर
लोग अपनों से भी प्रेम करना भूलते जा रहे हैं ,मैं ये सब और नहीं सह सकती मैं
भी इस दुनिया से जा रही हूँ….” और ऐसा कहते हुए तीसरी मोमबत्ती भी बुझ
गयी।

वो अभी बुझी ही थी कि एक मासूम बच्चा उस कमरे में दाखिल हुआ। मोमबत्तियों को बुझे देख वह घबरा गया , उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे और वह रुंआसा होते हुए बोला , “अरे , तुम मोमबत्तियां जल क्यों नहीं रही ,
तुम्हे तो अंत तक जलना है ! तुम इस तरह बीच मेंहमें कैसे छोड़ के जा सकती हो ?”

तभी चौथी मोमबत्ती बोली , ” प्यारे बच्चे घबराओ नहीं, मैं आशा हूँ और जब तक मैं जल रही हूँ हम बाकी मोमबत्तियों को फिर से जला सकते हैं।

यह सुन बच्चे की आँखें चमक उठीं, और उसने आशा के बल पे शांति, विश्वास, और प्रेम को फिर से प्रकाशित कर दिया।

जब सबकुछ बुरा होते दिखे ,चारों तरफ
अन्धकार ही अन्धकार नज़र आये , अपने भी पराये लगने लगें तो भी उम्मीद मत छोड़िये….आशा मत छोड़िये , क्योंकि इसमें इतनी शक्ति है
कि ये हर खोई हुई चीज आपको वापस दिल सकती है।

अपनी आशा की मोमबत्ती को जलाये
रखिये ,बस अगर ये जलती रहेगी तो आप किसी भी और मोमबत्ती को प्रकाशित कर सकते हैं।

उजाले के इस त्योहार पर आपको यही पंक्तियां भेंट कर के एक छोटी सी कोशिश कर रहा हूं ताकि आपकी जिंदगी में इन चारों मोमबत्तीयों की रौशनी हमेशा फैली रहे |

शुभ दिपावली

 
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Posted by on October 24, 2014 in અંગત

 

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… वक़्त नहीं लगता.


घर बनाने में वक़्त लगता है,
पर मिटाने में पल नहीं लगता.

दोस्ती बड़ी मुश्किल से बनती हैं,
पर दुश्मनी में वक़्त नहीं लगता.

गुज़र जाती है उम्र रिश्ते बनाने में,
पर बिगड़ने में वक़्त नहीं लगता.

जो कमाता है महीनों में आदमी,
उसे गंवाने में वक़्त नहीं लगता.

पल पल कर उम्र पाती है ज़िंदगी,
पर मिट जाने में वक़्त नहीं लगता.

जो उड़ते हैं अहम के आसमानों में,
जमीं पर आने में वक़्त नहीं लगता.

हर तरह का वक़्त आता है ज़िंदगी में,
वक़्त के गुज़रने में वक़्त नहीं लगता….

 

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…मैने दिवाली को मरते देखा.


पटाखो कि दुकान से दूर हाथों मे,
कुछ सिक्के गिनते मैने उसे देखा…

एक गरीब बच्चे कि आखों मे,
मैने दिवाली को मरते देखा.

थी चाह उसे भी नए कपडे पहनने की…
पर उन्ही पूराने कपडो को मैने उसे साफ करते देखा.

तुमने देखा कभी चाँद पर बैठा पानी?
मैने उसके रुखसर पर बैठा देखा.

हम करते है सदा अपने ग़मो कि नुमाईश…
उसे चूप-चाप ग़मो को पीते देखा.

थे नही माँ-बाप उसके..
उसे माँ का प्यार और पापा के हाथों की कमी मेहंसूस करते देखा.

जब मैने कहा, “बच्चे, क्या चहिये तुम्हे”?
तो उसे चुप-चाप मुस्कुरा कर “ना” मे सिर हिलाते देखा.

थी वह उम्र बहुत छोटी अभी…
पर उसके अंदर मैने ज़मीर को पलते देखा

रात को सारे शहर कि दीपो कि लौ मे…
मैने उसके हसते, मगर बेबस चेहरें को देखा.

हम तो जीन्दा है अभी शान से यहा.
पर उसे जीते जी शान से मरते देखा.

नामकूल रही दिवाली मेरी…
जब मैने जिदगी के इस दूसरे अजीब से पहेलु को देखा.

कोई मनाता है जश्न
और कोई रेहता है तरसता…

मैने वो देखा..
जो हम सब ने देख कर भी नही देखा.

लोग कहते है, त्योहार होते है जिदगी मे खूशीयो के लिए,

तो क्यो मैने उसे मन ही मन मे घूटते और तरसते देखा ?

Source: Whatsap msg

 

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એવું હવે ક્યાં કરી શકાય છે ?


ઘોડિયે નહીં તો કંઈ નહીં પણ
ઝૂલે તો હજુ ઝૂલી શકાય છે ,
પણ ભૂખ લાગે તો ક્યાં ફરી
મોંમાં અંગુઠો લઇ ચૂસાય છે ?

કંઇક શીખવાની જીજ્ઞાસા લઇ
ફરી સ્કૂલ કોલેજ જઈ શકાય છે ,
પણ દફતર ફેંકી રમવા દોડવું
એવું હવે ક્યાં કરી શકાય છે ?

ઝાડ પર નહીં તો કોલર ટયુનમાં
કોયલ- ટહુકા સાંભળી શકાય છે ,
પણ અમથું અમથું ક્યાં ફરીથી કોયલ સંગ ટહુકી શકાય છે ?

મિત્રો સંગે તાળી દઈ હજુ એ
જોને ખિલખિલ હસી શકાય છે ,
પણ મનગમતી ચીજ મેળવવા
ક્યાં હવે ભેંકડો તાણી રડાય છે ?

જા તારી કિટ્ટા છે કહીને હજુ એ
પળમાં દુશ્મની કરી શકાય છે ,
પણ બીજી જ પળે બુચ્ચા કરીને
ક્યાં કોઈને ય મનાવી શકાય છે ?

મોટા થવાની ઈચ્છા કરીને જુઓ
ઝટ મોટા તો થઇ જવાય છે ,
પણ ફરી પાછું નાના થઇ જવું ?
ક્યાં કોઈનાથી પણ થવાય છે???

 

विष्णु जी और लक्ष्मीजी संवाद


लक्ष्मी जी :
सारा संसार पैसे (मेरे) से चल रहा है,
अगर मैं नहीं तो कुछ नहीं …….

विष्णु जी (मुस्कुरा के) :
सिद्ध करके दिखाओ .

लक्ष्मी जी ने पृथ्वी पर एक शवयात्रा का दृश्य दिखया – जिसमे लोग शव पर पैसा फेंक रहे थे,
कुछ लोग उस पैसे को लूट रहे थे,
तो कुछ बटोर रहे थे
तो कोई छीन रहा था..

लक्ष्मी जी :
देखा …..
कितनी कीमत है पैसों की…

विष्णु जी:
परन्तु लाश नहीं उठी पैसे उठाने के लिए..??

लक्ष्मी जी:
अरे ……
लाश कैसे उठेगी वो तो मरी हुई है…
बेजान है ..!!

तब विष्णु जी ने बड़ा खूबसूरत जवाब दिया…
बोले :

जब तक मैं (प्राण)  शरीर में हूं..
तब तक ही तेरी कीमत है।
और जैसे ही मैं शरीर से निकला..
तेरी कोई कीमत नहीं है…!!

 

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श्रीकृष्ण की माया


सुदामा ने एक बार श्रीकृष्ण ने पूछा कान्हा, मैं आपकी माया के दर्शन करना चाहता हूं… कैसी होती है?”
श्री कृष्ण ने टालना चाहा, लेकिन सुदामा की जिद पर श्री कृष्ण ने कहा, “अच्छा, कभी वक्त आएगा तो बताऊंगा|”

और फिर एक दिन कहने लगे… सुदामा, आओ, गोमती में स्नान करने चलें| दोनों गोमती के तट पर गए| वस्त्र उतारे| दोनों नदी में उतरे… श्रीकृष्ण स्नान करके तट पर लौट आए| पीतांबर पहनने लगे… सुदामा ने देखा, कृष्ण तो तट पर चला गया है, मैं एक डुबकी और लगा लेता हूं… और जैसे ही सुदामा ने डुबकी लगाई… भगवान ने उसे अपनी माया का दर्शन कर दिया|

सुदामा को लगा, गोमती में बाढ़ आ गई है, वह बहे जा रहे हैं, सुदामा जैसे-तैसे तक घाट के किनारे रुके| घाट पर चढ़े| घूमने लगे| घूमते-घूमते गांव के पास आए| वहां एक हथिनी ने उनके गले में फूल माला पहनाई| सुदामा हैरान हुए| लोग इकट्ठे हो गए| लोगों ने कहा, “हमारे देश के राजा की मृत्यु हो गई है| हमारा नियम है, राजा की मृत्यु के बाद हथिनी, जिस भी व्यक्ति के गले में माला पहना दे, वही हमारा राजा होता है| हथिनी ने आपके गले में माला पहनाई है, इसलिए अब आप हमारे राजा हैं|”

सुदामा हैरान हुआ| राजा बन गया| एक राजकन्या के साथ उसका विवाह भी हो गया| दो पुत्र भी पैदा हो गए| एक दिन सुदामा की पत्नी बीमार पड़ गई… आखिर मर गई… सुदामा दुख से रोने लगा… उसकी पत्नी जो मर गई थी, जिसे वह बहुत चाहता था, सुंदर थी, सुशील थी… लोग इकट्ठे हो गए… उन्होंने सुदामा को कहा, आप रोएं नहीं, आप हमारे राजा हैं… लेकिन रानी जहां गई है, वहीं आप को भी जाना है, यह मायापुरी का नियम है| आपकी पत्नी को चिता में अग्नि दी जाएगी… आपको भी अपनी पत्नी की चिता में प्रवेश करना होगा… आपको भी अपनी पत्नी के साथ जाना होगा|

सुना, तो सुदामा की सांस रुक गई… हाथ-पांव फुल गए… अब मुझे भी मरना होगा… मेरी पत्नी की मौत हुई है, मेरी तो नहीं… भला मैं क्यों मरूं… यह कैसा नियम है? सुदामा अपनी पत्नी की मृत्यु को भूल गया… उसका रोना भी बंद हो गया| अब वह स्वयं की चिंता में डूब गया… कहाभी, ‘भई, मैं तो मायापुरी का वासी नहीं हूं… मुझ पर आपकी नगरी का कानून लागू नहीं होता… मुझे क्यों जलना होगा|’ लोग नहीं माने, कहा, ‘अपनी पत्नी के साथ आपको भी चिता में जलना होगा… मरना होगा… यह यहां का नियम है|’ आखिर सुदामा ने कहा, ‘अच्छा भई, चिता में जलने से पहले मुझे स्नान तो कर लेने दो…’ लोग माने नहीं… फिर उन्होंने हथियारबंद लोगों की ड्यूटी लगा दी… सुदामा को स्नान करने दो… देखना कहीं भाग न जाए…

रह-रह कर सुदामा रो उठता| सुदामा इतना डर गया कि उसके हाथ-पैर कांपने लगे… वह नदी में उतरा… डुबकी लगाई… और फिर जैसे ही बाहर निकला… उसने देखा, मायानगरी कहीं भी नहीं, किनारे पर तो कृष्ण अभी अपना पीतांबर ही पहन रहे थे… और वह एक दुनिया घूम आया है| मौत के मुंह से बचकर निकला है…सुदामा नदी से बाहर आया… सुदामा रोए जा रहा था|

श्रीकृष्ण हैरान हुए… सबकुछ जानते थे… फिर भी अनजान बनते हुए पूछा, “सुदामा तुम रो क्यों रो रहे हो?”सुदामा ने कहा, “कृष्ण मैंने जो देखा है, वह सच था या यह जो मैं देख रहा हूं|” श्रीकृष्ण मुस्कराए, कहा, “जो देखा, भोगा वह सच नहीं था| भ्रम था… स्वप्न था… माया थी मेरी और जो तुम अब मुझे देख रहे हो… यही सच है… मैं ही सच हूं…मेरे से भिन्न, जो भी है, वह मेरी माया ही है| और जो मुझे ही सर्वत्र देखता है,महसूस करता है, उसे मेरी माया स्पर्श नहीं करती| माया स्वयं का विस्मरण है…माया अज्ञान है, माया परमात्मा से भिन्न… माया नर्तकी है… नाचती है… नाचती है… लेकिन जो श्रीकृष्ण से जुड़ा है, वह नाचता नहीं… भ्रमित नहीं होता… माया से निर्लेप रहता है, वह जान जाता है, सुदामा भी जान गया था… जो जान गया वह श्रीकृष्ण से अलग कैसे रह सकता है!!!!

 
 

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