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Monthly Archives: ફેબ્રુવારી 2016

જિંદગી મેં યે હુનર ભી આજમાના ચાહિયે… જંગ અગર અપનોં સે હો, તો હાર જાના ચાહિયે!


Awesome article by my favorite JV

planetJV

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રિશ્તાના રસ્તા પરની દીવાલ વ્હાલથી તૂટે છે, સંબંધ જાળવવો હોય તો કશું છોડતા શીખવું પડે !

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નવા વિક્રમ સંવતના પહેલા લેખનું ઓપનિંગ ‘સ્પીકિંગ ટ્રી’ કિતાબના એક હૃદયસ્પર્શી કિસ્સાથી કરીએ :

વાત જરા જૂની છે. થોડા વર્ષો પહેલાની.

એક મિત્રનો પાસપોર્ટ બનાવવા પાસપોર્ટ ઓફિસે જવાનું થયું. એ દિવસોમાં ઈન્ટરનેટ પર ફોર્મ ભરાતું નહોતું. આવી ઓફિસોમાં દલાલોની બોલબાલા રહેતી. ઉપરના પૈસા લઈને દલાલો ફોર્મ વેંચવાથી જમા કરવાના કામ ‘જુગાડ’ કરીને કરતા. મિત્રને આવા ટાઉટ્સની ટ્રીકબાજીમાં ફસાવું નહોતું.

અમે પાસપોર્ટ ઓફિસે પહોંચ્યા. લાઈનમાં લાંબો સમય ઉભીને ફોર્મ લીધું. ચોકસાઈથી એ ફોર્મ ભર્યું. એમાં કલાકો નીકળી ગયા. હજુ તો એની સાથે ફી જમા કરવાની હતી.

અમે લાઈનમાં એ માટે ય ઉભા રહ્યા, પણ જેવો અમારો વારો આવ્યો, ત્યાં જ બેઠેલા સરકારી બાબુએ બારી બંધ કરીને કહ્યું કે “સમય પૂરો. હવે કાલે આવજો.”

અમે વિનંતી કરી, કહ્યું કે ‘બહારથી આવીએ છીએ. આખો દિવસ આજનો ખર્ચાઈ ગયો છે. ખાલી ફી જમા કરાવવાની જ વાત છે…

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Posted by on ફેબ્રુવારી 20, 2016 in Uncategorized

 

निदा फाजली नहीं रहे..


भारत के मशहूर हिंदी – उर्दू कवि मुक्तिदा हसन ‘निदा फाजली’ नहीं रहे. १२ अक्टूबर, १९३८ को जन्मे ये कविराज आज, ८ फरवरी, २०१६ को खुदा को प्यारे हो गये. वे ७७ साल के थे. हमने उनकी अनेक गज़ल जगजीत सिंघ द्वारा सुनी है, आज जगजीत जी की जन्मतिथि अब निदा जी की पुण्यतिथि बन गई है.

कश्मीरी परिवार के निदा जी दिल्ही में जन्मे और ग्वालियर में आपने शिक्षा पाई थी. उनके पिता जी भी उर्दू के कवि थे. १९४७ में देश के बटवारे के दौरान पिताजी पाकिस्तान गये थे, लेकिन निदा जी भारत में रहे थे. युवा निदा ने एक बार मंदिर के पास से गुजरते हुए सूरदास का राधा के बारे में लिखा पद सुना था, जिसमे श्री कृष्ण से जुदा होने का राधा जी के दुःख का वर्णन था, उससे प्रभावित हो कर वे कवि बने थे, ऐसा निदा फाजली कहते थे. मीरा और कबीर से प्रभावित निदा गाज्ली ने अपनी कविता का दायरा टी. एस. इलियट, गोगोल, एंटोन चेखोव और टाकासाकी तक विस्तुत किया था.

काम की खोज में निदा जी १९६४ में बम्बई आये थे. शुरूआती दौर में उन्हों ने हिंदी साप्ताहिक धर्मयुग और ब्लिट्स में लिखा था. उनसे हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक-लेखक प्रभावित थे. उनको मुशायरा में बुलाया जाता था. उनकी गज़ल और अदायगी लोकप्रिय हुई. उसमे गज़ल, दोहा और नज़म का मिश्रण श्रोताओ को मिलता था. उन्हों ने कविता को सादगी बक्षी. उनकी प्रसिध्ध पंक्ति: ‘दुनिया जिसे कहते है, जादू का खिलौना है, मिल जाये तो मिटटी है, खो जाये तो सोना है’. आपको उनकी ‘आ अभी जा (सुर), तू इस तरहा से मेरी जिंदगी में सामिल है (आप तो ऐसे न थे) और होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है, इश्क कीजे और समजिये झिंदगी क्या चीज़ है (सरफ़रोश) याद होगी. उस गज़ल का एक बेहतरीन शेर है, ‘हम लबों से कह नहीं पाए, उनसे हाल-ए-दिल कभी; और वो समझे नहीं, ये ख़ामोशी क्या चीज़ है’.  ‘इस रात की सुबह नहीं,’ और ‘गुडिया’ में भी उनके गीत थे. कमाल अमरोही की ‘रज़िया सुलतान (१९८३) बनती थी और उनके गीतकार जाँ निसार अख्तर का निधन हुआ. तब निदा फाजली ने उस फिल्म के दो गाने लिखे थे.

निदा फाजली को भारत का बटवारा पसंद नहीं था. कोमी और राजकीय दंगो के सामने वे आवाज़ उठाते थे. उसका नतीजा ये था की १९९२ के दंगो में उन्हें अपने आप को बचने किसी दोस्त के घर रहना पड़ा था. उनके ‘राष्ट्रिय एकता’ का पुरस्कार मिला था. उन्होंने उर्दू, हिंदी और गुजराती में २४ पुस्तकें लिखी थी. उनकी कुछ कविता बच्चे स्कूल में पढते हैं. उनके आत्मकथात्मक उपन्यास ‘दीवारों के बिच’ के लिये मध्य प्रदेश सरकार ने निदा फाजली को ‘मीर तकी मीर’ एवोर्ड दिया था. उनके प्रसिद्द लेखन कार्य है – मोर नाच, हम कदम और सफर में धुप तो होगी..

निदा फाजली को साहित्य अकादमी का एवोर्ड १९९८ में, श्रेष्ठ गीतकार का स्टार स्क्रीन एवोर्ड ‘सुर’ के लिये और २०१३ में पद्मश्री का इल्काब मिला था.
निदा जी को हमने सूरत के गाँधी स्मृति भवन में तीन-चार बार सुना है.. मेरा उनका लिखा प्रिय शेर है, ‘घर से मस्जिद हो बहुत दूर, तो चलो यूँ ही सही, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये.’ कवि अपनी कविताओं से अमर होते है, निदा फाजली भी अमर है.

हमारे प्रिय कवि मित्र मुकुल चोकसी ने निदा फाजली को अंजलि देते हुए शेर लिखा है –

ભેગા કરે અનેક કવિ, એક ‘નિદા’ ન થાય, એને કહો કે આવી રીતે અલવિદા ન થાય. (प्रस्तुति: नरेश कापडीआ)

 
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Posted by on ફેબ્રુવારી 8, 2016 in અંગત, Shayri